शायद// Perhaps Poem by Aftab Alam

शायद// Perhaps

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शायद हमसे कुछ कहीं तो छूटा है
तभी तो हमारा रब हमसे रूठा है
मनाने को तो मना लिये होते अब तक
जुबाँ फिसलती है, दिल जो झूठा है ।


शायद कहीं कुछ तो कमीं है
तभी तो आंखो में नमीं है
अभी अभी शाख से परिंदा उड़ा है
टहनी से एक पत्ता टूटा है

आंखो में हवस जुबाँ में सादगी
महज दिखावे की खलिश अदायगी
हमने खुद को यूँ छलाया है
हमने खुद को बहुत लूटा है

शायद हमसे कुछ कहीं तो छू27174टा है
तभी तो हमारा रब हमसे रूठा है
मनाने को तो मना लिये होते अब तक
जुबाँ फिसलती है, दिल जो झूठा है ।

Friday, March 21, 2014
Topic(s) of this poem: philosophy
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Aftab Alam

Aftab Alam

RANCHI,
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