सिसकता भारत। Poem by ramesh rai

सिसकता भारत।

सिसकता भारत है पहचान हमारी
सिसकता भारत है अरमान हमारी
कभी औरों के लिए सिसकते हैं
कभी खुद के लिए सिसकते हैं।

बुद्ध ने रोया औरों की पीड़ा से
जग ने रोया अपनी पीड़ा से
कोई रोया दूसरे के सुख से
हम ने रोया जग की पीड़ा से।

अच्छा है पेड़ पौधें नहीं रोते
नहीं रोते नभचर जलचर
नहीं रोते तारे अनगिनत
नहीं रोते पर्वत सरोवर।।

बस एक ही जीव है
जिसे हंसना भी आता है।

Created on 21/9/2025
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@ Ramesh Rai

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