M. Asim Nehal

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हौज़े कौसर में ज़म ज़म का सैलाब आया - Virtues Of Life - Poem by M. Asim Nehal

करते रहे मौत से हम सौदा ज़िन्दगी का
और मौत ने हंसकर कहा आख़िरत में हिसाब दूँगी

लगे रहे ता उम्र हम जिसकी फ़िराक़ में
वह मिली भी तो आकर खाके बिसात में

अरमानो के बुलबुले कब फूटते चले गए
मिली जो भी मोहलत दिन गिनने में गुज़र गए

हैरत से भरे दिन थे और हसरत से भरी रातें
साँसे छूटती रही हम रह गए क्यों पछताते

बेताब ख्यालों को ये किसका पैग़ाम आया
जाग गयी तमन्ना कुछ हासिल का इंतज़ाम आया

अब न हम जुम्बिश की ताब रखेंगे कभी
हौज़े कौसर में ज़म ज़म का सैलाब आया

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Karte rahe maut se sauda zindagi ka
Aur maut ne haskar kaha aakhirat me hisab dungi

Lage rahe ta umr hum jiski firaq me
wo mili bhi toh aakar kha-e-bisaat me

Armaano ke bulbule kab phoote chale gaye
Mili jo mohlat din ginne me guzar gaye

Hairat se bhare din the aur hasrat se bhari raatein
saanse chooti rahi hum reh gaye kyun pachtaye

Betaab khayalon ko ye kiska paigaam aaya hai
jaag gayi tamanna kuch haasil ka intezaam aaya hai

Ab na hum jumbish ti taab rakhenge kabhi
Hauze-Kausar me Zam Zam ka sailaab aaya hai.....

Topic(s) of this poem: life and death

Form: Ghazal


Comments about हौज़े कौसर में ज़म ज़म का सैलाब आया - Virtues Of Life by M. Asim Nehal

  • Anita Sharma (11/19/2015 9:58:00 AM)


    अरमानो के बुलबुले कब फूटते चले गए
    मिली जो भी मोहलत दिन गिनने में गुज़र गए....good lord you write so beautiful, , i can simple say amazing words are less to explain your work, , loved it loved it
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    0 person did not like.
  • Rajnish Manga (10/19/2015 3:47:00 AM)


    आपकी यह नज़्म नायाब कही जायेगी. इसमें ज़िन्दगी के विविध रूपों का वर्णन किया गया है. नीचे की पक्तियाँ mythology से प्रभावित हैं और कविता में मनमोहक रूप से प्रयोग की गयी हैं:
    अब न हम जुम्बिश की ताब रखेंगे कभी
    हौज़े कौसर में ज़म ज़म का सैलाब आया
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  • (9/7/2015 2:26:00 AM)


    Awesome ghazal, so you are an all rounder.......Wonderful conversation between life and death. (Report) Reply

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Poem Submitted: Saturday, September 5, 2015

Poem Edited: Tuesday, November 22, 2016


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