DineshK Pandey


अग्नि परीक्षा - Poem by DineshK Pandey

ले ली जीवन ने अग्नि परीक्षा मेरी।
मैं आया था जग में बनकर
लहरों का दीवाना,
यहां कठिन था दो बूंदों से
भी तो नेह लगाना
पानी का है वह अधिकारी
जो अंगार चबाए,
ले ली जीवन ने अग्नि परीक्षा मेरी
सुनते हो?
पानी का है वह अधिकारी
जो अंगार चबाए,
अंतरतम के शोलों को था
खुद मैंने दहकाया,
अनुभवहीन दिनों में मुझको
था किसने नहलाया,
भीतर की तृष्णा जब चीखी
सागर, बादल, पानी,
बाहर की दुनिया की लपटों ने घेरों
ले ली जीवन ने अग्नि परीक्षा मेरी।
काठ कोयला जल कर बनता
और कोयला राखी,
छिपा कहीं मेरी छाती में
था स्वर्गों का साखी,
दो आगों के बीच बना कर
नीड़ रहा जो गाता,
ज्वाला के दिन में, निशि में धूम्र-घनेरी।
ले ली जीवन ने अग्नि परीक्षा मेरी।
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Topic(s) of this poem: classic


Comments about अग्नि परीक्षा by DineshK Pandey

  • Dineshk Pandey (11/12/2015 11:14:00 PM)


    @kumarmani mahakul,
    Thanks!
    Happy BHAI-DUJ! ! !
    (Report) Reply

    0 person liked.
    0 person did not like.
  • Dineshk Pandey (11/12/2015 11:07:00 PM)


    Dear Ratnakat Mandlik,
    धन्यवाद।
    भाईदूज की शुभ-कामनाएं! ! !
    (Report) Reply

  • (11/12/2015 10:43:00 PM)


    Bahut hi pasand hai hame aapki Agni Pariksha. Such kahe to dost jab kisi ke dil main aagni utpanna hota hai aur jwala ki lapte uthane lagati hai, tab wah insan Kavita jeene lagata hai aur kavi ban jata hain.
    Thanks for sharing.10 points.
    (Report) Reply

    Dineshk Pandey (11/12/2015 11:13:00 PM)

    आभार।
    भाई-दूज की शुभ-कामनाएं! ! !

    Dineshk Pandey (11/12/2015 11:10:00 PM)

    आभार।
    भाईदूज की शुभ-कामनाएं! ! !

  • Kumarmani Mahakul (11/12/2015 5:53:00 PM)


    Being affectionate of waves of mind you take my fire exam. What an interesting and amazing poem shared really. Nicely penned definitely...10 (Report) Reply

    Dineshk Pandey (11/12/2015 11:09:00 PM)

    Thanks!
    Happy Bhai-Duj! ! !

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Poem Submitted: Thursday, November 12, 2015



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