दिल की गिरह खोल दी मैंने
पंछी को पिंजरे से आज़ाद भी कर दिया
मस्त मौला बन भटका सेहराओं में
कुछ वादे तोड़ दिए बेशक
तितलियों के लिए फूल भी न तोडा
वादियों में गीत गए मोहब्बत के
नदियों और समुन्दर पर झूला झूला
पहाड़ों कि चढ़ाई की
हवाओं संग दौड़ लगायी
बेवजह भटकता रहा यहाँ वहां
जब थक हार कर बैठ गया
तब यादों का पिटारा खोला
देख दांग रह गया
माला में जड़ी चमकदार मोतियों सी
वक़्त के घुंघरुओं पे थिरकती, नृत्य में मग्न
एक खुशबु उडी हवाओं में
जो महका गयी वक़्त कि फिज़ाओ को
छोड़ गयी फिर बेचैन मुझे
एक सफर कि तैयारी को
जहाँ से कोई फिर न लौटा, जो एक बार गया
मेरी यादों का पिटारा था मेरे पास, जो था खूब खासम खास।। एक शेर अर्ज़ करना चाहता हूँ जब आ जाती है दुनिया घूम फिर कर अपने मरकज़ पर तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँ नहीं आते एक बेहतरीन शायराना अंदाज जो दिल को छू गया 1000++
माला में जड़ी चमकदार मोतियों सी वक़्त के घुंघरुओं पे थिरकती, नृत्य में मग्न एक खुशबु उडी हवाओं में जो महका गयी वक़्त कि फिज़ाओ को छोड़ गयी फिर बेचैन मुझे एक सफर कि तैयारी को जहाँ से कोई फिर न लौटा, जो एक बार गया.....dil ko choo gaye ye sabd aapke janab. Bahut bahut aabhar iss nayab rachna ke liye.
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Wah kya badiya kavita ki rachna ki hai