मुआमला Poem by M. Asim Nehal

मुआमला

Rating: 5.0

लफ़्ज़ों में बयां हो नहीं सकता, ये दिल का मुआमला है
अश्कों से अदा हो नहीं सकता, ये जज़्बातों का मुआमला है
साँसे चल रही हैं, ये ज़िंदा होने की अलामत नहीं है
किसी के दर्द को समझ सके तो ये ज़िंदा होने का मुआमला है

किसी के हालात को समझे, ये एहसासात का मुआमला है
किसी की हौसला अफ़ज़ाई करे, ये इज़्ज़त का मुआमला है
महनत तो हर कोई करता है, सबको उसका फल कहाँ मिलता है
फल मिले न मिले, कोई इसे सराहे ये इंसानियत का मुआमला है

COMMENTS OF THE POEM
Varsha M 08 October 2020

Bahut behtareen kalpna ko sapne kagaz me ootar diya maumla gambhir to hai.

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Sharad Bhatia 08 October 2020

एक उर्दू की बेहतरीन कविता मैने पहले भी कहा हैं अभी कह रहा हूँ कि शब्दों के सरताज आप ही हो चाहें उर्दू हों, हिन्दी हो या अंग्रेज़ी आप के लिखे एक - एक शब्द दिल छू जाते हैं 1000+

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महनत तो कर कोई करता है, सबको उसका फल कहाँ मिलता है फल मिले न मिले, कोई इसे सराहे ये इंसानियत का मुआमला है Yes. All are not rewarded for their hard work, but its a mtter of human approach..*****

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Deepak S S 07 October 2020

Bahut badiya. Maja aagay pad kar

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