ग़ाज़ा पट्टी में दुःखो कि एक कहानी फिर सामने आयी है,
यह संघर्ष की भूमि है जहाँ खून नदी की तरह बहता है,
यहाँ मासूमों की चीखें और निराशा के स्वर गूंजते है
अहंकार, अत्याचार और आतंक मानवता पर हावी हो जाता है।
1945 से इस पवित्र भूमि पर अधिकारों की लड़ाई चल रही है।
सम्मान का स्नघर्ष और आज़ादी कि लड़ाई है,
क्या दुनिया के इस हिस्से में मानवता मौजूद है?
क्या किसी ने मदद के लिए पुकार सुनी?
क्या मनुष्य की अमानवीयता का इससे अधिक कोई प्रमाण हो सकता है?
मौत की दुर्गंध जहां नफरत के निशान मानवता को घायल करते हैं,
कौन ग़ाज़ा के बच्चों और उनके अनिश्चित भविष्य की परवाह करता है,
वे सत्ता और लालच के खेल में एक मोहरा बन गए हैं।
दुनिया तमाशबीन बनकर देखती है,
जैसे-जैसे संघर्ष कभी न ख़त्म होने वाले चक्र के साथ बढ़ता जाता है,
निर्दोषों का खून पवित्र भूमि को कलंकित करता है,
क्या समंदर की लहरें शांति की गुहार लेकर जाएगी.
सत्ता का अहंकार और शक्ति की लालसा ने,
निर्दयी हृदय वाले घमंडी नेताओं को अंधा कर दिया है,
यहाँ एक ऐसा अत्याचार हो रहा है जो मानवता को शर्मसार करता है,
आशा की रेत में अब शांति की मृगतृष्णा मंडरा रही है।
शांति बहाल करने के लिए कौन साथ खड़ा होगा,
जब दुनिया दो भागों में बंट गयी है
और स्थिति को अपने हित के चश्मे से देखती है,
ग़ाज़ा के लोगों के लिए युद्ध के बादल सदा बने रहने वाले हैं,
बहुत कम उम्मीद है क्योंकि रक्त की मांग इसकी आपूर्ति से अधिक है।
THIS is the translation I found using Google; it is a little different (just a little) . ;) Thanks for commenting on my 'wife/mermaid' poem. bri ;)
Asim, I looked up the translation of the title before looking at poem and noticing that you kindly provided the translaton. Maybe if I look farther I'll find you've left the English text for me to read? bri ;)
Ah, yes, I see your English version posted now. ;)