चेतना गीत / सब पढ़े! सब बढ़े! !
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करो मेहनत से तुम सब पढ़ाई बबुआ,
नाहीं जीवन होई आगे दुखदायी बबुआ ।
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आँखों में समंदर है
तो हाथों में रूहानी है
मेरा दिल दरिया है
जिसमें चाहत का पानी है
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आदमी आम होता हैं आदमी ख़ास होता है,
आदमी के लिये ही आदमी बकवास होता है।
आदमी की नहीं सुनता जब कोई इस जमाने में,
निराशाओं का मारा वो सूखा घास होता है ॥
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हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई
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हम सबकी पहचान है हिन्दी,
होठों की मुस्कान है हिन्दी ।
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आओ हम सब वृक्ष लगाएं
धरा को अपने हरा करें हम
शीतल छाया पाएं
पशु पक्षी को आश्रय दें हम
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माँ बाप और हम
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जब हम छोटे थे
कितने अच्छे थे
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मुहब्बत में बहे आँसू,
मुसीबत में बहे आँसू
दिल का दर्द हर किस्सा
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दिन दूना औ रात चौगुना
खूब बढ़ रहा भ्रष्टाचार
यै पी एम, सी एम का करिहै
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मैं किसान हूं, अन्नदाता हूं
ताजे फल व हरी सब्जियां उगाता हूं
खुद रुखा सुखा खाता हूं साहब!
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महिला दिवस पर विशेष
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मेरी एक कविता ✍
'वहशी दरिन्दा'
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