M. Asim Nehal

Gold Star - 163,883 Points (26th April / Nagpur)

चोट लगती रही ज़ख्म खाते रहे! ! ! ! - Poem by M. Asim Nehal

चोट लगती रही ज़ख्म खाते रहे
ज़िन्दगी के मज़े भी उठाते रहे

दाग़ लगने दिए न बुराई के हम
दामन अपना सदा ही बचाते रहे

मुश्किलों से भी तो हमने खेला किया
दर्द को भी तो अपने दबाते रहे

आप की बेरुखी से न बेचैन हुए
चैन से आपको भी मनाते रहे

सोच अपनी जहाँ से मुख़तलिफ़ ही सही
मुत्तफ़िक़ी के सबक हम सीखते रहे

चोट लगती रही ज़ख्म खाते रहे
ज़िन्दगी के मज़े भी उठाते रहे

Topic(s) of this poem: life, love

Form: Free Verse


Comments about चोट लगती रही ज़ख्म खाते रहे! ! ! ! by M. Asim Nehal

  • Abhilasha Bhatt (2/28/2016 9:42:00 AM)


    Beautiful poem.....liked it....thank you for sharing :) (Report) Reply

    1 person liked.
    0 person did not like.
  • Akhtar Jawad (12/24/2015 6:13:00 AM)


    Ek khoobsoorat ghazal........................................................ (Report) Reply

  • (12/13/2015 12:35:00 PM)


    Wah kya badiya hai..10++ (Report) Reply

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Poem Submitted: Thursday, December 10, 2015



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