Aftab Alam

Gold Star - 39,838 Points (15 th April 1967 / RANCHI,)

यहां उम्मिदों पर पहरे हैं - Poem by Aftab Alam

चलो भाग चलें, यहां उम्मिदों पर पहरे हैं,
पल-पल छल का डर, साजिश कितने गहरे हैं,
मैं ख्वाब बांटता हूं और वो ख्वाब बेचते हैं
ख्वाब बेच कर वो आराम से ख्वाब देखते हैं
इन डूबते ख्वाबों को किनारा तो मिले
इन बेसहारों को जरा सहारा तो मिले
इस अंधे ख्वाब की पूरी हक़ीक़त क्या है?
इनकी ज़िंदगी की बताओ क़ीमत क्या है?
लालच में डुबो कर तुम्हें उसने अंधा किया है?
मुर्ख हो, अपने ही हाथो तुमने जहर पिया है!
जब जानोगे हक़ीक़त तो तुम बड़ा पछताओगे,
अपनी किश्ती को अपने हाथो ही तुम डुबाओगे,
चारो तरफ आग ही आग हैं, खतरे ही खतरे हैं,
चलो भाग चलें, यहां उम्मिदों पर पहरे हैं,


Comments about यहां उम्मिदों पर पहरे हैं by Aftab Alam

  • Neela Nath Das (3/17/2015 8:52:00 PM)


    A fantastic write on the essence of present age of decay and destruction. (Report) Reply

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Poem Submitted: Tuesday, March 17, 2015



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