Suno!
Laut kar ab kabhi tum mat aana
Mere dil ki mitti ko
...
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एक अज़ीम नज़्म. इसमें एक टूटे हुये दिल का दर्द ही नहीं, बग़ावत की आमादगी भी नज़र आती है. ऐसी प्रभावशाली रचना कम ही देखने को मिलती है. शुक्रिया आरज़ू महक जी. यह नज़्म मेरी पसंदीदा कविताओं में शामिल हो रही है. कुछ पंक्तियाँ नीचे उद्धरित कर रहा हूँ: मेरे दिल की वादी / के जिसमे वफ़ा के परिंदे सरे शाम पेड़ों पे अपनी दुआओं के पर खोलते हैं फ़ज़ा में मुहब्बत के सुर घोलते हैं सुनो तुम उसी शहर को अपना मसकन बना लो जहां.... हर कहानी फ़कत / जिस्म की भूख से मुनसलिक है.
Wah wah kya baat hai........Dil choo jana wali nazm hai, umda.
Khoobsoorat nazm jisne beintiha mutasir kiya, bahut pasand aai.
Suno! Laut kar ab kabhi tum mat aana..........fantastic! A brilliant poem....Top score!