Rajnish Manga

Gold Star - 152,998 Points (September 10,1951 / Meerut (UP) / Presently at Faridabad (Haryana) , India.)

ऐसा क्यों? (Hindi) - Poem by Rajnish Manga

एक बार पुनः मुझको ऐसा लगा
जैसे स्वयं अपने से ही
हो रहा हूँ जुदा
ऐसा क्यों?

एक बार तो ऐसा तब था हुआ
जबकि मैं झील में कूद कर
घात करने चला था
उस दिन मैं खंड खंड
विभाजित हुआ
कुछ ‘मैं’ मेरे साथ
कुछ ‘मैं’ अलग थलग
पहले पहल मुझको ऐसा लगा
जैसे अपने से ही हो रहा हूँ जुदा
ऐसा क्यों?

आज वो सब नहीं
किन्तु है, कुछ तो है.
आज मेरा मैं मुझसे बाग़ी नहीं
आज तुम मुझसे
हो रहे हो जुदा.
और ये निश्चित है कि
हम अब ‘हम’ नहीं
‘मैं’ हो गए हैं.
तुम दूर मुझसे चले जा रहे हो
लगता है मैं ही चला जा रहा हूँ
स्वयं दूर खुद से
मेरा एक हिस्सा है तुम में भी
अतः एक अदना हिदायत थमा दूँ तुम्हें
कभी फुरसत तुम्हें जो मिले
चुपके से अपने
हृदय के किसी कोने में देख लेना
उसी में बैठा मिलूँगा तुम्हें
देख लेना
एक बार पुनः मुझको ऐसा लगा
जैसे स्वयं अपने से ही
हो रहा हूँ जुदा
ऐसा क्यों?

Topic(s) of this poem: heart, life, parting, self, suicide, together

Form: Free Verse


Comments about ऐसा क्यों? (Hindi) by Rajnish Manga

  • Akhtar Jawad (8/12/2016 3:15:00 PM)


    A painful parting, so nicely described by the poet that it touches the heart of the reader. A lovely poem by Rajnish Manga. (Report) Reply

    0 person liked.
    0 person did not like.
  • Kumarmani Mahakul (11/1/2015 12:50:00 PM)


    Having a feeling in mind that the self is separating from self is wonderful but on practice of meditation we can stabilize self and realize well. Very nice and thoughtful expression shared interestingly...10 (Report) Reply

    Rajnish Manga Rajnish Manga (11/6/2015 11:01:00 AM)

    Thanks for your wonderful review and also for your appreciative comments on this poem, Kumarmani ji.

  • Mohammed Asim Nehal (11/1/2015 11:52:00 AM)


    अपने से जुदा होना अक्सर इंसान को सामंजस्य में डाल देता है और कई सवाल खड़े कर देता है, आपने एक बढ़िया कवित का माध्यम से कितनी सरलता से यह सब कुछ कह दिया, कितना कठिन है मन को समझाना की जो हम में था अब मै हो चला..............अति उत्तम राजनीशजी, धन्यवाद.......10++++ (Report) Reply

    Rajnish Manga Rajnish Manga (11/6/2015 10:58:00 AM)

    So nice of you to have critically reviewed and appreciated the poem. Thanks.

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Poem Submitted: Sunday, November 1, 2015



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