Yashovardhan Kulkarni


ढूँढूं बस दिल के दरसाने - Dhundhu Bas Dil Ke Darsane - Poem by Yashovardhan Kulkarni

सजग सजगिया सारी,
चले हैं, जले हैं मेरे चूल्हे जो पड़े उनमें उस धूल के बवंडर

अपनी भीगी भीगी जान को बचाए,
नानी के पास अपने जो उसको छोड़ आए, के बच जाए शायद

सारे आंसुओं को अपने सीने के हरे-भरे दरख्तों में छुपाके,
परेशां दिल के कानों में अहिस्ता कुछ लफ्ज लोरी गुनगुनाके

चला हूँ, हूँ चला, हर सांस है अगला कदम,
उस ओर जिस ओर है सजगता के वादों का शेहर,
चला हूँ, हूँ चला, हर सांस है अगला कदम

क्या हुआ जो निर्जनता अपनी आँखों में हूँ भरा,
अब जो हूँ चला,
चला हूँ, हूँ चला, हर सांस है अगला कदम

उसी वक्त है लगी हुई है एक बड़ी साधी सी गुहार,
आगे बढ़ते कदम तो है लेकिन ढूंड रहे हैं हर वक्त जैसे किसी कहानी के आसार
रिश्ता हमारा हमने है जाना उसी

जाने अनजाने, लेकिन हर वक्त-
गिन सके और ना गिने जा सकनेवाले लम्हों में,
हर सांस को अपना केहनेकी बचपने में

और कभी-
तत्वों के जोर और तकाजे में,
चाहत जो फैल जाए, विचित्र हक मांगे, नियंत्रण मांगे दूसरों पे

आगे बढाए थे मैंने तो कदम, सजगता के आधार जो हर बात बात
पर खो गया था फिर में क्यूँ ना पाने पे दिल के दरसाने इस शख्स में आज?

Topic(s) of this poem: fulfilment


Comments about ढूँढूं बस दिल के दरसाने - Dhundhu Bas Dil Ke Darsane by Yashovardhan Kulkarni

  • Rajnish Manga (11/3/2015 10:28:00 PM)


    बहुत सुंदर. अभिव्यक्ति का नयापन आकर्षित करता है. धन्यवाद. निम्नलिखित कथन उल्लेखनीय है:
    आगे बढ़ते कदम तो है लेकिन ढूंड रहे हैं हर वक्त जैसे किसी कहानी के आसार
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Poem Submitted: Tuesday, November 3, 2015



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