Yashovardhan Kulkarni


क्या यहाँ पे कहीं? - Kya Yahan Pe Kahin? - Poem by Yashovardhan Kulkarni

यहाँ पे कहीं एक सिगरेट मिल सकती है क्या?

दिल को चंद पल खुला आसमान दिख सकता है क्या?
चरम पे चढ़ बैठी पहल को सुलझाने वालों को आशा के नामोनिशान नसीब हो सकते हैं क्या?
मेरे बचपन को बिना परिक्षण सांस लेने का मौका मिल सकता है क्या?
अपनी बात सहूलियत से सुनाने के लिए किसी और के न सहीं मेरेही कान मिल सकते हैं
क्या?
हमें एक बात बताइए, यहाँ पे कहीं एक सिगरेट मिल सकती है क्या?


व्यापार से चलती इस दुनिया में भटकती मेरी आह को बैचेनी के यह सूरज अपने सर पर ढो सकती है क्या?
बंजारोंसा आयें हैं आपके घर, हमें दो कदम और अनजाने में खो जाने के लिए थोड़ी शीतलता मिल सकती है क्या?

हम और आप, आप और हम, थक गएँ हैं इन फरकों से,
हमें आत्मा को पूजने के लिए थोड़ी आत्मीयता मिल सकती है क्या?
ऐसा है अगर तोह, छोड़ें हम सफ़र की बात,
लेकिन हमें बताएं, की हस पाने के ले थोड़ी खुद्दारी मिल सकती क्या,
और रो पाने के लिए थोड़ी सच्चाई मिल सकती है क्या?

हमें एक बात बताइए, यहाँ पे कहीं एक सिगरेट मिल सकती है क्या?

Topic(s) of this poem: fulfilment


Comments about क्या यहाँ पे कहीं? - Kya Yahan Pe Kahin? by Yashovardhan Kulkarni

  • Rajnish Manga (12/8/2015 12:27:00 PM)


    सिगरेट मिले या न मिले, लेकिन आपने इस कविता के माध्यम से व्यक्ति के अकेलेपन एवम् उसकी आतंरिक घुटन का बड़ा ही प्रभावशाली चित्रण किया है. अभिव्यक्ति का नयापन गज़ब का है- 'व्यापार से चलती इस दुनिया में भटकती मेरी आह को बैचेनी का यह सूरज अपने सर पर ढो सकता है क्या? ' और भी:
    हमें आत्मा को पूजने के लिए थोड़ी आत्मीयता मिल सकती है क्या?
    और रो पाने के लिए थोड़ी सच्चाई मिल सकती है क्या?
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Poem Submitted: Tuesday, December 8, 2015



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