Yashovardhan Kulkarni


कैसा कलम चलाएँ, के कोई खलिश गुमराह न रहे - Poem by Yashovardhan Kulkarni

उस तरफ या इस तरफ से
कोई मकान बिना रोज़ ज़रूर है
कैसा कलम चलाएँ
के कोई खलिश गुमराह न रहे

वक्त से नाराज़ हैं यह
अब हमसे उम्मीद लगाएं है यह
कैसी खनक निछावर करदें
के यह हकीकत की बरौनियाँ को सुनहरी शाम के काजल से रंगदे

रात से अपने रिश्ते को लेकर परेशां है यह
दुनिया में बद्किस्मिति के शहजादों से इन तर्कों में कैद है यह
एक दफा हमें सूरज वफ़ा करना है इसपर
के इस बेबुनियाद अँधेरे के पीछे छुप गई दिव्यता की तलाश है हमें

Topic(s) of this poem: love and life


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Poem Submitted: Tuesday, September 8, 2015



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