Yashovardhan Kulkarni


आँखों पे तरस आता हैं मुझे मेरे कभी कभी - Aankhon Pe Taras Aata Hai Mujhe Mere Kabhi Kabhi - Poem by Yashovardhan Kulkarni

आँखों पे तरस आता है मुझे कभी कभी मेरे,
डरी डरी जिंदगी जब दौड़ती है मिल जाने अँधेरे से कभी

दिल में युद्धभूमि जैसा तूफान होता है कभी,
और हाथ की औसत खून की लकीरों में सिर्फ अफ़सोस से सौदा करनेवाला जमीनदार होता है जभी

बार बार में देखूं अपनी हाथों के तरफ
शरमिंदा होके
फिर देखूं
नहीं होता यकीं

आजकल इस मक़ाम को झूठ-मुठ कमल स्वरुप बतलाया जाता है,
इन मेरी आँखों पे मुझे आजकल तरससा आता है

बार बार में देखूं अपनी हाथों के तरफ
शरमिंदा होके
फिर देखूं
नहीं होता यकीं

मैं-
अपने ही दिए को बुझानेवाला,
अपने ही धोखे का जतन करनेवाला,
रुकने और रुक जाने वाले पे कलम चलनेवाला

मैं-
एक निचे जाने वाले सड़क पे अपने ही साए को महसूस कर कर शांति पानेवाला,
रत्नों से मुंह मोड़नेवाला,
दीवारों से अपनी मुहब्बत का इजहार करनेवाला

अचंबित हूँ, शरमिंदा हूँ
आँखे खुली की खुली है, सच्चाई से तक उतनी ही
जितना में अपनी ही चाहतों से दूर हूँ

अचंबित हूँ, शरमिंदा हूँ
शाम का मोहताज होना चाहता हूँ उतना ही
जितना दिल की मायूसियों को खोना चाहता हूँ

अचंबित हूँ,
तरसदार हूँ अपनी ही आँखों पे आज

Topic(s) of this poem: loss, love and life


Comments about आँखों पे तरस आता हैं मुझे मेरे कभी कभी - Aankhon Pe Taras Aata Hai Mujhe Mere Kabhi Kabhi by Yashovardhan Kulkarni

  • (10/27/2015 3:48:00 PM)


    Wah wah, Kitni badhiya kavita likhi aapne (Report) Reply

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Poem Submitted: Tuesday, October 27, 2015



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