श्रीसूर्योपनिषद्(हिन्दी पद्यानुवाद) Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

श्रीसूर्योपनिषद्(हिन्दी पद्यानुवाद)

श्रीसूर्योपनिषद्(हिन्दी पद्यानुवाद)

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श्रवण मेरे सुनें मँगल, यजन करते देखें मँगल।
स्वस्थ रहें तन-बदन, स्तुति करें आपका मँगल।।

जीवन पल बीतें मेरे, हम करते रहें देवता ध्यान।
यशस्वी महान देवाधिपति इन्द्र करें कल्याण।।

सव^व्यापक भास्कर करते रहें पूण^अभीष्ट ।
गरुड़देव करते रहें सदा, नष्ट हो जायें अनिष्ट ।।

श्रीबृहस्पतिदेव करते रहें पूण^ सकल साधन।
शरीर, मन, आत्मा शाँत बने, कर सकें आराधन।

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अब हम करते अथवर्वेद के सूर्य -मन्त्र पारायण
ऋषिवर ब्रह्मा छन्द गायत्री देवता सूर्यनारायण।

बीज हँस प्रणव अग्नि नारायण शक्ति ही्ँ रश्मि।
दिव्य ज्योति प्रकाशित कीलकँ गगन द्यौ रुपिणी

धर्म अर्थ काम मोक्ष, चतुवि^ध परम पुरुषार्थ ।
सब बिधि अनुकूल बनें, प्राप्त हों पँचम परमार्थ।

षड्दल कमल आसन प्रति दल बीजमँत्र शोभैं।
सप्त घोटक रथ असवार, दर्शन मुनि जन लोभैं।

कनक आभा सम देदीप्यमान, चत^भुज बदन।
द्वि हस्त कमल शोभते, सरसिज सुषमा सदन।

एक भुजा बने अभयमुद्रावर, दूजे वरदान दान।।
दर्शन कर निहाल हो जाते, बनते ब्राह्मण विद्वान

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हम करते भू: भुव: स्व: त्रिलोकपति प्रभुवर ध्यान।
प्रकाशित हों विमल बुद्धि, करें सत्य अनुसंधान।

दिवाकर देव जगत स्वामी, कहते देवों में प्रत्यक्ष।
सदा सव^दा सबके सामने लखैं हर दिवस चक्षु

प्रभाकर परम आत्मा सृष्टि, रवि चराचर जायक
यज्ञ वृष्टि पोषण कर्ता, अन्न जल पोषक पालक।
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हम करते आदित्य देव को प्रणाम, सप्रेम नमन।
आप ही समस्त कर्ता-भर्ता, करते अहर्निश वँदन

ब्रह्मा, विष्णु, शिव आप ही जानता नहीं कौन!
वाणी भी न कह सकती महिमा, रहतीं सदा मौन

ऋक्, साम, यर्जु, अथवर्वेद आप, शास्त्र सब तुम
वेदों के गानमय छन्द आप, सँगीत आचार्य तुम

पृथ्वी जल वायु अग्नि आकाश, सबमें विराजते
समस्त दस दिशाओं में, आप ही देवता भ्राजते।।
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सभी देव मार्तंड उत्पन्न, सविता सब ही के पिता
अखिल जग ज्योति रवि रश्मि प्रकाशित होता।

अर्क अन्त: - चतुष्टय मन बुद्धि चित्त अहँकार।
देव स्वयं प्राण अपान व्यान उदान समान प्रकार

देव पँचेन्द्रिय, श्रोत्र चक्षु नासा रसना त्वक रुप ।
बिबिध रुप दर्शन होते रहते परम स्वरूप अनूप।
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हँस कर्मेन्द्रिय, वाक् पाणि पाद उपस्थ गुप्त अँग
देव एव पँच ज्ञानेन्द्रिय, शब्द स्पर्श रुप रस गँध।

सूर्यदेवता स्वयं शब्द अर्थ रस छन्द नाद रुप
भास्कर स्वयं विज्ञानमय आनन्द आनंदघन रुप।

करते भानु मित्र अवराधन, करते प्रणाम बारँबार
दे दें अब परम पद, पहुंचा दें अब नित्य दरबार।

भ्राजते आपके नित्य नव चमकीले प्रकाश पुँज
कृपानुग्रहकारी करें करुणा अनुग्रह करकँज।।

देदीप्यमान रश्मियों को अब आप सिमेट लें।
निज अँक कोमल सुभगवर में मुझे लपेट लें।।
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जिन दिनेश देव से सभी लेते हैं जगत जन्म।
सभी विलीन हो जाते उनमें, यह नहीं है भ्रम।।

हम कर रहे उन देवता का दर्शन, करते नमन।
विमल दृष्टि प्रदान करें, करते नित्य रवि वँदन।।

सह्त्र रवि रश्मि आलोकित का करते हम ध्यान।
बुद्धि करें प्रेरित हमारे, हो जाये जीवन कल्याण

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आदित्य सव^व्यापक देवता हमारे सामने-पीछे,
परम अन्त: यामी देव, शोभते ऊपर और नीचे।


दीघ^ आयु प्रदान करें, हम करते उनके आराधन
जीवनभर आशीष मिले, प्राप्त हो सुख साधन।।

सूर्य अष्टाक्षर मँत्र में सम्मिलित तीन परम अक्षर
'ऊँ'प्रणव, 'घृणिः''सूर्य आदित्य' मिले, ' अष्टाक्षर'

'ऊँ घृणिः सूर्यादित्याय'सूर्य मँत्र परम महान।
जो जन करे पूजन जप, सब बिधि कल्याण।।
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जन जो करते मँत्र जप, बन जाते ब्रह्मस्वरूप।
रविदेव सम्मुख पढ़ते, बनते भय कष्ट मुक्त रुप।।

दारिद्रय दूर होते उनके, अभक्ष्याभक्ष्य से मुक्त।
अनुचित कर्म व्यभिचार, सँभाषण दोष मुक्त।।
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मध्यान्ह मँत्र जप करते, बने न घातकमहापातक
अपात्र को नहीं दान कीजिए, सब बिधि घातक

प्रातः जो जन पढ़ते, वे बनते देखे जाते कुबेर।
वेद अर्थ जान लेते, नहीं कभी भी उलट -फेर।।

त्रिपाठी जन करते प्राप्त शत यज्ञ फल महान।
महामृत्यु पर करते विजय, होता परमकल्याण।।
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