sanjay kumar maurya

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Gazal....Watawaran Ko Bhi Nind Ab - Poem by sanjay kumar maurya

वातावरण को भी नींंद अब आती नहींं है
ये हवाऐंं भी गात को सहलाती नहींं हैंं

उस दरख्त को देखिए कितना उदास है
कोयल ही नहींं टिटहरी भी टहटहाती नहींं है

हर शख्स की आँखोंं मेंं बेशरम भरा है
अस्मत लुट रही है पर हया आती नहींं है

क्या आपको भी ये मौसम बदला नहींं लगता
हमको चाल इसकी तनिक भी सुहाती नहींं है

ये बेजांं दीवार भी कहतीं हैंं सब राज हमसे
वो है कि गैरोंं की गूफ्तगू बताती नहींं है

उस वादियोंं मेंं हर शाख हरे तो हैंं मगर
बसंंत मेंं भी कोंंपलोंं मेंं मोजरेंं आती नहींं हैंं

कितने अरसे हो गये हैंं गाँव से दूर हैंं हम
मिट्टियोंं से आज भी कोई सदा आती नहींं है

Topic(s) of this poem: nature


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Poem Submitted: Friday, March 20, 2015

Poem Edited: Saturday, April 18, 2015


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