Yashovardhan Kulkarni


किसीका होनेका मन करता है - Kisika Honeka Man Karta Hai - Poem by Yashovardhan Kulkarni

हमें जिस अपनेपनसे नींद से उठाते हो,
उसे चूमने का मन करता है

हमें जिस सादगी से टोकते हो,
उसे चुराके अपने में समाने का मन करता है

दिन हर दिन सता गई बैचैनी,
अब किसीके आँखों में जीने का मन करता है

जो बची हुई थी वोह भी खा ली है, हर सवाल बस एक साद दे गई है,
इस जिंदगी को बड़े चाव से जीने का मन करता है,
अब हमें किसीका विश्वास होनेका मन करता है

उठकर गिर जाए, गिरकर फिर उठ जाए,
हमें राहसे तब कोई शिकायत नहीं होगी,
जो अब हमें किसी निर्मल आँगन का मौसम होनेका मन करता है

कोई जो आके हमारे हाथों में खुशबू की तस्वीर थमा जाए,
अब हमें आधार और निराधार दोनों हो ऐसा काव्यगत दर्पण होने का मन करता है

अब हमें किसीका होनेका मन करता है

Topic(s) of this poem: fulfilment


Comments about किसीका होनेका मन करता है - Kisika Honeka Man Karta Hai by Yashovardhan Kulkarni

  • Kumarmani Mahakul (11/8/2015 4:40:00 PM)


    There are many desires which come as dreams in mind but still who like to live in easy in eyes with such dreams we wonder. Coming up sometimes we fall down but falling again we come up and still need support of somebody is special and lovely. Very marvelous work shared here really. Nice sharing.10 (Report) Reply

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Poem Submitted: Sunday, November 8, 2015



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