Yashovardhan Kulkarni


अम्मा, दक्षिण की हवाओं को बेह जाने दे - Amma, Dakshin Ki Hawaoon Ko Tu Beh Jaane De - Poem by Yashovardhan Kulkarni

अम्मा,
दक्षिण की हवाओं को तू बेह जाने दे
नुकीली धुप से भरे इस पनघट को तू अपने आवेश में खुदको खोने दे

मधुकर की बुने दुनिया में जो तूने उसे था दिखाया,
राजकुमार तेरा हाँ हैं उसीके बाहर हैं जाना चाह रहा

क्यूँ तू डरी है अब क्यूँ,
क्यूँ तू डरी है अब क्यूँ

है,
हाँ उसने ही जतन किए हैं
सतराह साल चाँद महीने और बारा हाकिम
उसको भी तो देखने ही थे, कभी न कभी तो पहचानने ही थे
जिज्ञासा जानने खरे रंग उस चांदनी

सताई सताई है तुझे जो
अनजाने राह की उसकी बातें
काटे कटिया सारी
आँख तेरी हैं भर है आई

एक बात तू समझ,
तेरी कहानी है वोह जाने
सारे मौसम जो तूने है आँखों की निचली झुरियों में जिए

तेरा ये राजकुमार जो है चले
तेरे ही दुनिया की खुशबु में हर रात है थका सा आके सो जाए

क्यूँ तू डरी है तब क्यूँ
सतराह साल चाँद महीने और बारा हाकिम
दक्षिण की हवाओं को तू आज बेह जाने दे

Topic(s) of this poem: fulfilment


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Poem Submitted: Tuesday, November 3, 2015



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