Yashovardhan Kulkarni


पत्थरों की रानी - pattharon ki raani - Poem by Yashovardhan Kulkarni

लो आगई पत्थरों की रानी,
ना किसी बात की अब की पूरी परीक्षा होगी
बस ख़तम करने पे ख़ुशी होगी

बादलों से धुल का जैसे रिश्ता है अब,
दिल की बातों का अब अकाउंट सा है कहीं,

नाखूनों की माला ये पहनती,
आघात संगीत की तपस्या से खुश ये होती,

कान कहीं क्या इसके छट गएँ है,
बस खुदही की बात को यह सुन पाती,

कर्म कर्म और कर्म कर्म बस ये कहती रेहती,
जुबाँ से तो यूँ ही कभी फिसल ये जाती,

मलाल के लम्बे हाथों कभी ये काट खाती,
अरे क्या बताएं, मलाल से प्यार का कभी अपने आप से ये इजहार भी करती!

क्या पता?
क्या पता,
किसी इच्छित फुल की ये बेटी,
या बस रातों से परेशानसी कोई ये लड़की,

इसके साथ चलूँ तो कैसे चलूँ,
साथ ना चलूँ तो कैसे ना चलूँ,

ऐसे मेरे पत्थरों की ये रानी.

Topic(s) of this poem: act, action


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Poem Submitted: Tuesday, March 31, 2015

Poem Edited: Tuesday, March 31, 2015


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